पार्क एवं प्रकृति

चांदपुर :

चांदपुर एक गांव है जो कि देवगढ़ से 10 कि. मी. की दूरी पर स्तिथ है। यह गांव आम तौर पर चन्देलों एवं जैनों से सम्बंधित पुरातात्विक खोजों के लिए मशहूर है। वास्तव में यह जगह जैनों के पुराणिक एवं अनूठे मंदिरों को देखने के लिए आदर्श जगह है जहाँ जैन मंदिरों के अलावा विष्णु मंदिर भी मौजूद हैं। इसीलिए चांदपुर पर्यटकों के बीच एक लोकप्रिय स्थल है खासतौर से उनके बीच जो पुरातत्व की खोज एवं विरासत स्थलों में रूचि रखते हैं।

मदनपुर :

मदनपुर एक गांव है जो ललितपुर से 75 कि. मी. की दुरी पर स्थित है जिसका नाम उसके संस्थापक चंदेल शासक, मदन वर्मा के नाम पर पड़ा है। इस गांव में विष्णु, जैन तथा शिव मंदिरों के कई खंडहर मौजूद हैं जो पर्यटकों के बीच अत्यधिक लोकप्रिय हैं। इन खंडहरों के सामने एक ताल भी मौजूद है जो चंदेल राज्य में बनायीं गई थी। कई ऐतिहासिक स्मारक एवं प्राकृतिक सौंदर्यता से परिपूर्ण होने के कारण यह जगह एक अच्छा पर्यटन स्थल है ललितपुर में।

बानपुर :

पर्यटन के दृष्टिकोण से अनेक स्थान है। जिसमें बुन्देल मंदिर 18 वीं सदी तथा शांतिनाथ जी का मंदिर 18 वीं सदी एवं अन्य जैन मंदिन 9 वीं सदी गणेश खैरा (पुरा) की गणेश प्रतिमा 9 मनकी ताला का विष्णु मंदिर पाली खेरा आदि का शिव मंदिर पुरातात्विक एवं ऐतिहासिक दृष्टि से अत्याधिक महत्वपूर्ण हैं।

जाखलौन पम्प कैनाल :

इस जनपद की प्रथम लिफ्ट कैनाल जाखलौन पम्प कैनाल है। जो बन्दरगुढा गाँव के पास स्थित होने के कारण बेतवा जलाशय से इस क्षेत्र के लोगों को लगभग छोटी-बड़ी नहरों से 35 कि.मी. तक के काश्तकारों को सिंचाई करती है। यह स्थान पहाड़ी की ऊँचाई पर स्थित है। यहां पर चढ़ने से प्रकृति की ओर और जलाशय की एक ओर वन के हरे भरे दृश्य देखने को मिलते हैं।

दूधाई :

जिला मुख्यालय से करीब 35 कि.मी. दूर पाली बालाबेहट मार्ग के पठारी इलाके में बसा यह उजाड़ सा गांव चन्देलकाल में समृद्ध व्यापारिक नगर था। पूरे के पूरे नगर के भग्वानशेष इस गांव में पड़े देखे जा सकते है। इस गांव में दो प्राचीन वष्णव मंदिरों में भग्नावशेष पड़े हैं। जिनके खण्डर बताते हैं कि इनका कला सौष्ठव खजुराहों के मंदिरों से अधिक रूपवान था। यही दूधई का प्रसिद्ध चंदेलकालीन तालाब भी मौजूद है। जिसके बारे में कहा जाता कि इसी की जलधारा से शहजाद नदी निकली है। इस छोटे से गांव का प्राकृतिक सौन्दर्य भी अनूठा है। सुप्रसिद्ध इतिहासकार अलबरूनी ने अपने सृजन से इसे महाकेन्द्र के रूप में रूपायत किया है। इस छोटे से गांव में अनेक प्राचीन, दुर्लभ अभिलेख मिले है, जिनके द्वारा पता चलता है कि चंदेल शासक देवलब्धिं के नाम पर ही कालान्तर में इसका नाम दूधई पड़ा।

चुवन आश्रम :

आयुर्वेद के जनक महर्षि चुवन का आश्रम नीलकण्ठेश्वर मंदिर पाली के पीछे स्थित है। हालांकि अब आश्रम के नाम पर प्राकृतिक रमणीकता के अलावा वर्तमान में कुछ भी मौजूद नहीं है। लेकिन यह ऐतिहासिक तथ्य इस बात को तसदीक करता है कि इस स्थान पर कभी वनस्पतियों का शोधन होता रहा है। इसी स्थल पर करीब 80 फीट ऊंची नृसिंह प्रतिमा पहाड़ पर गढ़ी गयी है। जो आज भी अपने मूल रूप में मौजूद है। इस स्थल पर प्राकृतिक सौन्दर्य इतना सुरम्य है कि नैनीताल की वादियों से भी सुन्दर एवं मनमोहक है।

नाहर घाटी - राजघाटी का संयोजन :

घाटी से बेताव नदी में उतरने के लिए सीढ़ियों का निर्माण किया जाये। बीच में विश्रांति स्थल स्थापित किये जायें। बेताव नदी के तट पर प्लेटफार्म का निर्माण का नौका बिहार की व्यवस्था की जाये। बेतवा नदी के मध्य में स्थित द्वीपों पर प्रकाश की समुचित व्यवस्था की जायें।